Aakhri Kash · آخری کش
poetry2017
हमें तलप थी उनकी, मानो आख़री cigarette हों,
मौक़ा मिलता, होंठों से लगा लेते;
शिद्दत इतनी थी मोहब्बत में, की जलने देते पूरी,
अपने ये लब जला लेते;
मगर हिद्दत-ए-इश्क़ का ये क़हर देखिए जनाब,
उन्होंने लब ज़रूर लगाया, मगर कुछ इस क़दर जलाया,
की फूँका गया मे पूरा,
और वो कह गयी,
टेर काफ़ी नहीं, दो कश और फूँका देते..